
भयंकर इसलिए भी कि आगामी पंचवर्षिय में टिकट मिलने की आस लगाए उम्मीदवारों का मुरझाया चेहरा लॉटरी से बाहर निकलते ही फ्रस्ट्रेशन निकालने लगा है। एक महाशय से हमने भी पूछा क्या हुआ भई आपके वार्ड का खूब तो दौड़ा भागी किए हैं। जवाब आया, मूड मत सरकाईए, महिला हो गया है। अब 5 साल छिले हैं हम आलू, पैसा मेहनत लगा के पार्टी को मजबूत बनाया अब आलू उबल गया तो समोसा खाने कोई मोहतरमा आएंगी। यही स्थिति अमूमन राज्य के हर हिस्से में हर वर्ग के बीच है। इन सबके बीच अगर चाय चौपालों में देंखें तो चर्चा भी वही है ये जीत सकता है, ये हार सकता है। इसको मिलना चाहिए, ये इतना खर्चा करेगा। इतना रोमांच तो मैंने विधानसभा और लोकसभा में नहीं देखा। स्थितियां ये हैं कि अभी से पैदलबाजी और नमस्कार दुआ सलाम का दौर शुरू हो गया है। जिन्होंने कभी किसी को दिपावली ईद की बधाई नहीं दी, वो देवउठनी एकादशी का पोस्टर लगाकर शुभकामनाएं दे रहे हैं। यह सब देखकर मैंने मन में सोंचा यदि राजनीति का यह फार्मेट यदी इतना रोमांच और शालिनता लेकर आता है कि, आचार विचार व्यवहार बदल जाए तो इसे 5 साल की बजाय हर साल होना चाहिए। मोहल्लों में शांति होगी, नेताजी फावड़ा झाडू उठाएंगे। वैसे इस राजनीति की खूबी ये है कि नेताजी चाहे लोकसभा जीत जाएं,इमेज अच्छी नहीं है तो जनता वार्ड में लोकप्रियता का बहीखाता दिखा देती है। तो आप आनंद लिजिए अच्छा बनाउ राजनीति की।
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